श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.11

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तन्‍नो भवानीहतु रातवेऽन्‍नं

क्षुधार्दितानां नरदेवदेव।

यावन्‍न नङ्क्ष्यामह उज्झितोर्जा

वार्तापतिस्त्वं किल लोकपालः॥ ११

tanno bhavānīhatu rātave'nnaṃ

kṣudhārditānāṃ naradevadeva|

yāvanna naṅkṣyāmaha ujjhitorjā

vārtāpatistvaṃ kila lokapālaḥ|| 11

अर्थ

आप समस्त लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं, आप ही हमारी जीविकाके भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्‍वर! आप हम क्षुधापीड़ितोंको शीघ्र ही अन्‍न देनेका प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्‍न मिलनेसे पहले ही हमारा अन्त हो जाय’॥ ११॥✎ 392

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #392 शब्दोंके बीचका स्थान: हैं,आप → हैं, आप

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