श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुवर! प्रजाका करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देरतक विचार करते रहे। अन्तमें उन्हें अन्नाभावका कारण मालूम हो गया॥ १२॥
पृथुः प्रजानां करुणं निशम्य परिदेवितम्।
दीर्घं दध्यौ कुरुश्रेष्ठ निमित्तं सोऽन्वपद्यत॥ १२
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—कुरुवर! प्रजाका करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देरतक विचार करते रहे। अन्तमें उन्हें अन्नाभावका कारण मालूम हो गया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 490) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/17/12/