॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.17.10
वयं राजंजाठरेणाभितप्ता
यथाग्निना कोटरस्थेन वृक्षाः।
त्वामद्य याताः शरणं शरण्यं
यः साधितो वृत्तिकरः पतिर्नः॥ १०
vayaṃ rājaṃjāṭhareṇābhitaptā
yathāgninā koṭarasthena vṛkṣāḥ|
tvāmadya yātāḥ śaraṇaṃ śaraṇyaṃ
yaḥ sādhito vṛttikaraḥ patirnaḥ|| 10
अर्थ
‘राजन्! जिस प्रकार कोटरमें सुलगती हुई आगसे पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेटकी भीषण ज्वालासे जले जा रहे हैं। आप शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरणमें आये हैं॥ १०॥