श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

को वै३नं परिच४क्षीत वेनमेकमृतेऽशुभम्।

प्राप्त ईदृशमैश्‍वर्यं यदनुग्रहभाजनः॥ ३३

ko vainaṃ paricakṣīta venamekamṛte'śubham|

prāpta īdṛśamaiśvaryaṃ yadanugrahabhājanaḥ|| 33

अर्थ

अहो! जिनकी कृपासे इसे ऐसा ऐश्‍वर्य मिला, उन श्रीहरिकी निन्दा अभागे वेनको छोड़कर और कौन कर सकता है’?॥ ३३॥✎ 388 1603

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—तं।

    (मुद्रित पृष्ठ 481)
  2. ४

    प्रा० पा०—परिरक्षेत।

    (मुद्रित पृष्ठ 481)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्‌की
  • #1603 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज-सिंहासनके → राजसिंहासनके

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