यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासनके योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णुभगवान्की निन्दा करता है॥ ३२॥✎ 3881603
नायमर्हत्यसद्वृत्तो नरदेववरासनम्।
योऽधियज्ञपतिं विष्णुं विनिन्दत्यनपत्रपः॥ ३२
यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासनके योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्लज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णुभगवान्की निन्दा करता है॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 481) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/32/
टिप्पणियाँ
२
प्रा० पा०—देवं।
(मुद्रित पृष्ठ 481)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्की