इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्चय कर लिया। वह तो भगवान्की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया॥ ३४॥✎ 389
इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः।
निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया॥ ३४
इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्चय कर लिया। वह तो भगवान्की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 481) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)