श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

इत्थं व्यवसिता हन्तुमृषयो रूढमन्यवः।

निजघ्नुर्हुङ्कृतैर्वेनं हतमच्युतनिन्दया॥ ३४

itthaṃ vyavasitā hantumṛṣayo rūḍhamanyavaḥ|

nijaghnurhuṅkṛtairvenaṃ hatamacyutanindayā|| 34

अर्थ

इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोधको प्रकट कर उन्होंने उसे मारनेका निश्‍चय कर लिया। वह तो भगवान्‌की निन्दा करनेके कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारोंसे ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया॥ ३४॥✎ 389

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #389 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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