श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के प्रमुख पार्षदोंके ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुवजीने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रममें रहनेवाले मुनियोंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया॥ २८॥✎ 1600
निशम्य वैकुण्ठनियोज्यमुख्ययो-
र्मधुच्युतं वाचमुरुक्रमप्रियः।
कृताभिषेकः कृतनित्यमंगलो
मुनीन् प्रणम्याशिषमभ्यवादयत्॥ २८
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—भगवान्के प्रमुख पार्षदोंके ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुवजीने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्यकर्मसे निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रममें रहनेवाले मुनियोंको प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 470) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/28/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)