श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च।

इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम्॥ २९

parītyābhyarcya dhiṣṇyāgryaṃ pārṣadāvabhivandya ca|

iyeṣa tadadhiṣṭhātuṃ bibhradrūpaṃ hiraṇmayam|| 29

अर्थ

इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारणकर उसपर चढ़नेको तैयार हुए॥ २९॥✎ 1600

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1600 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नित्य-कर्मसे → नित्यकर्मसे

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