इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारणकर उसपर चढ़नेको तैयार हुए॥ २९॥✎ 1600
परीत्याभ्यर्च्य धिष्ण्याग्र्यं पार्षदावभिवन्द्य च।
इयेष तदधिष्ठातुं बिभ्रद्रूपं हिरण्मयम्॥ २९
इसके बाद उस श्रेष्ठ विमानकी पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदोंको प्रणाम कर सुवर्णके समान कान्तिमान् दिव्य रूप धारणकर उसपर चढ़नेको तैयार हुए॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 470) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)