श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथायजत यज्ञेशं क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः।

द्रव्यक्रियादेवतानां कर्म कर्मफलप्रदम्॥ १०

athāyajata yajñeśaṃ kratubhirbhūridakṣiṇaiḥ|

dravyakriyādevatānāṃ karma karmaphalapradam|| 10

अर्थ

वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणावाले यज्ञोंसे भगवान् यज्ञपुरुषकी आराधना की; भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता-सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफलके दाता भी हैं॥ १०॥

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