इडविडाके पुत्र कुबेरजीने बड़े प्रसन्न मनसे उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुवजी भी अपनी राजधानीको लौट आये॥ ९॥
तस्य प्रीतेन मनसा तां दत्त्वैडविडस्ततः।
पश्यतोऽन्तर्दधे सोऽपि स्वपुरं प्रत्यपद्यत॥ ९
इडविडाके पुत्र कुबेरजीने बड़े प्रसन्न मनसे उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुवजी भी अपनी राजधानीको लौट आये॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 468) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/9/