॥ श्रीहरिः ॥
सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन्।
ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम्॥ ११
sarvātmanyacyute'sarve tīvraughāṃ bhaktimudvahan|
dadarśātmani bhūteṣu tamevāvasthitaṃ vibhum|| 11
अर्थ
सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे॥ ११॥
सर्वात्मन्यच्युतेऽसर्वे तीव्रौघां भक्तिमुद्वहन्।
ददर्शात्मनि भूतेषु तमेवावस्थितं विभुम्॥ ११
सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युतमें प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुवजी अपनेमें और समस्त प्राणियोंमें सर्वव्यापक श्रीहरिको ही विराजमान देखने लगे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 468) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/12/11/