श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.11.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

नास्मत्कुलोचितं तात कर्मैतत्सद्विगर्हितम्।

वधो यदुपदेवानामारब्धस्तेऽकृतैनसाम्॥ ८

nāsmatkulocitaṃ tāta karmaitatsadvigarhitam|

vadho yadupadevānāmārabdhaste'kṛtainasām|| 8

अर्थ

तात! तुम जो निर्दोष यक्षोंके संहारपर उतर रहे हो, यह हमारे कुलके योग्य कर्म नहीं है; साधु पुरुष इसकी बड़ी निन्दा करते हैं॥ ८॥

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