मनुजीने कहा—बेटा! बस, बस! अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरकका द्वार है। इसीके वशीभूत होकर तुमने इन निरपराध यक्षोंका वध किया है॥ ७॥
अलं वत्सातिरोषेण तमोद्वारेण पाप्मना।
येन पुण्यजनानेतानवधीस्त्वमनागसः॥ ७
मनुजीने कहा—बेटा! बस, बस! अधिक क्रोध करना ठीक नहीं। यह पापी नरकका द्वार है। इसीके वशीभूत होकर तुमने इन निरपराध यक्षोंका वध किया है॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.11.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 464) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/11/7/