श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.10.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

तस्य ते चापनिर्मुक्ता भित्त्वा वर्माणि रक्षसाम्।

कायानाविविशुस्तिग्मा गिरीनशनयो यथा॥ १७

tasya te cāpanirmuktā bhittvā varmāṇi rakṣasām|

kāyānāviviśustigmā girīnaśanayo yathā|| 17

अर्थ

उनके धनुषसे छूटे हुए तीखे तीर यक्ष-राक्षसोंके कवचोंको भेदकर इस प्रकार उनके शरीरोंमें घुस गये, जैसे इन्द्रके छोड़े हुए वज्र पर्वतोंमें प्रवेश कर गये थे॥ १७॥

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