ध्रुवजीने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करके शत्रुओंके दिल दहला दिये और फिर प्रचण्ड बाणोंकी वर्षा करके उनके अस्त्र-शस्त्रोंको इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है॥ १६॥
धनुर्विस्फूर्जयन्दिव्यं द्विषतां खेदमुद्वहन्।
अस्त्रौघं व्यधमद्बाणैर्घनानीकमिवानिलः॥ १६
ध्रुवजीने अपने दिव्य धनुषकी टंकार करके शत्रुओंके दिल दहला दिये और फिर प्रचण्ड बाणोंकी वर्षा करके उनके अस्त्र-शस्त्रोंको इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे आँधी बादलोंको तितर-बितर कर देती है॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 462) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/16/