श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.10.15

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नदत्सु यातुधानेषु जयकाशिष्वथो मृधे।

उदतिष्ठद्रथस्तस्य नीहारादिव भास्करः॥ १५

nadatsu yātudhāneṣu jayakāśiṣvatho mṛdhe|

udatiṣṭhadrathastasya nīhārādiva bhāskaraḥ|| 15

अर्थ

यक्षलोग अपनी विजयकी घोषणा करते हुए युद्धक्षेत्रमें सिंहकी तरह गरजने लगे। इसी बीचमें ध्रुवजीका रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरेमेंसे सूर्यभगवान् निकल आते हैं॥ १५॥

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