उस समय जो सिद्धगण आकाशमें स्थित होकर यह दृश्य देख रहे थे, वे सब हाय-हाय करके कहने लगे—‘आज यक्षसेनारूप समुद्रमें डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया’॥ १४॥
हाहाकारस्तदैवासीत्सिद्धानां दिवि पश्यताम्।
हतोऽयं मानवः सूर्यो मग्नः पुण्यजनार्णवे॥ १४
उस समय जो सिद्धगण आकाशमें स्थित होकर यह दृश्य देख रहे थे, वे सब हाय-हाय करके कहने लगे—‘आज यक्षसेनारूप समुद्रमें डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया’॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.10.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 462) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/10/14/