॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.10.18
भल्लैः संछिद्यमानानां शिरोभिश्चारुकुण्डलैः।
ऊरुभिर्हेमतालाभैर्दोर्भिर्वलयवल्गुभिः ॥ १८
bhallaiḥ saṃchidyamānānāṃ śirobhiścārukuṇḍalaiḥ|
ūrubhirhematālābhairdorbhirvalayavalgubhiḥ || 18
अर्थ
विदुरजी! महाराज ध्रुवके बाणोंसे कटे हुए यक्षोंके सुन्दर कुण्डलमण्डित मस्तकोंसे, सुनहरी तालवृक्षके समान जाँघोंसे, वलयविभूषित बाहुओंसे, हार, भुजबन्ध, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियोंसे पटी हुई वह वीरोंके मनको लुभानेवाली समरभूमि बड़ी शोभा पा रही थी॥ १८-१९॥