॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.10.12
अभ्यवर्षन् प्रकुपिताः सरथं सहसारथिम्।
इच्छन्तस्तत्प्रतीकर्तुमयुतानि त्रयोदश॥ १२
abhyavarṣan prakupitāḥ sarathaṃ sahasārathim|
icchantastatpratīkartumayutāni trayodaśa|| 12
अर्थ
यक्षोंकी संख्या तेरह अयुत (१,३०,०००) थी। उन्होंने ध्रुवजीका बदला लेनेके लिये अत्यन्त कुपित होकर रथ और सारथीके सहित उनपर परिघ, खड्ग, प्रास, त्रिशूल, फरसा, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी तथा चित्र-विचित्र पंखदार बाणोंकी वर्षा की॥ ११-१२॥