श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.60

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स्वाहाभिमानिनश्चाग्नेरात्मजांस्त्रीनजीजनत्।

पावकं पवमानं च शुचिं च हुतभोजनम्॥ ६०

svāhābhimāninaścāgnerātmajāṃstrīnajījanat|

pāvakaṃ pavamānaṃ ca śuciṃ ca hutabhojanam|| 60

अर्थ

अग्‍निदेवकी पत्‍नी स्वाहाने अग्‍निके ही अभिमानी पावक, पवमान और शुचि—ये तीन पुत्र उत्पन्‍न किये। ये तीनों ही हवन किये हुए पदार्थोंका भक्षण करनेवाले हैं॥ ६०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें