इन्हीं तीनोंसे पैंतालीस प्रकारके अग्नि और उत्पन्न हुए। ये ही अपने तीन पिता और एक पितामहको साथ लेकर उनचास अग्नि कहलाये॥ ६१॥
तेभ्योऽग्नयः समभवन् चत्वारिंशच्च पञ्च च।
त एवैकोनपञ्चाशत्साकं पितृपितामहैः॥ ६१
इन्हीं तीनोंसे पैंतालीस प्रकारके अग्नि और उत्पन्न हुए। ये ही अपने तीन पिता और एक पितामहको साथ लेकर उनचास अग्नि कहलाये॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 411) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/61/