श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.6

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तां कामयानां भगवानुवाह यजुषां पतिः।

तुष्टायां तोषमापन्‍नोऽजनयद् द्वादशात्मजान्॥ ६

tāṃ kāmayānāṃ bhagavānuvāha yajuṣāṃ patiḥ|

tuṣṭāyāṃ toṣamāpanno'janayad dvādaśātmajān|| 6

अर्थ

जब दक्षिणा विवाहके योग्य हुई तो उसने यज्ञभगवान्‌को ही पतिरूपमें प्राप्त करनेकी इच्छा की, तब भगवान् यज्ञपुरुषने उससे विवाह किया। इससे दक्षिणाको बड़ा सन्तोष हुआ। भगवान्‌ने प्रसन्‍न होकर उससे बारह पुत्र उत्पन्‍न किये॥ ६॥✎ 353 354 355

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #353 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #354 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञभगवान् को → यज्ञभगवान्‌को
  • #355 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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