श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.5

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आनिन्ये स्वगृहं पुत्र्याः पुत्रं विततरोचिषम्।

स्वायम्भुवो मुदा युक्तो रुचिर्जग्राह दक्षिणाम्॥ ५

āninye svagṛhaṃ putryāḥ putraṃ vitatarociṣam|

svāyambhuvo mudā yukto rucirjagrāha dakṣiṇām|| 5

अर्थ

मनुजी अपनी पुत्री आकूतिके उस परमतेजस्वी पुत्रको बड़ी प्रसन्‍नतासे अपने घर ले आये और दक्षिणाको रुचि प्रजापतिने अपने पास रखा॥ ५॥✎ 353 354 355

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #353 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #354 शब्दोंके बीचका स्थान: यज्ञभगवान् को → यज्ञभगवान्‌को
  • #355 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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