श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.54

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

दिव्यवाद्यन्त तूर्याणि पेतुः कुसुमवृष्टयः।

मुनयस्तुष्टुवुस्तुष्टा जगुर्गन्धर्वकिन्‍नराः॥ ५४

divyavādyanta tūryāṇi petuḥ kusumavṛṣṭayaḥ|

munayastuṣṭuvustuṣṭā jagurgandharvakinnarāḥ|| 54

अर्थ

आकाशमें मांगलिक बाजे बजने लगे, देवतालोग फूलोंकी वर्षा करने लगे, मुनि प्रसन्‍न होकर स्तुति करने लगे, गन्धर्व और किन्‍नर गाने लगे॥ ५४॥✎ 356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #356 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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