श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.55

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत्परममङ्गलम्।

देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः॥ ५५

nṛtyanti sma striyo devya āsītparamamaṅgalam|

devā brahmādayaḥ sarve upatasthurabhiṣṭavaiḥ|| 55

अर्थ

अप्सराएँ नाचने लगीं। इस प्रकार उस समय बड़ा ही आनन्द-मंगल हुआ तथा ब्रह्मादि समस्त देवता स्तोत्रोंद्वारा भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५५॥✎ 356

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #356 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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