उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं॥ २५॥
कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान्।
तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी॥ २५
उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.1.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 407) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/1/25/