श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.25

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कृपावलोकेन हसद्वदनेनोपलम्भितान्।

तद्रोचिषा प्रतिहते निमील्य मुनिरक्षिणी॥ २५

kṛpāvalokena hasadvadanenopalambhitān|

tadrociṣā pratihate nimīlya munirakṣiṇī|| 25

अर्थ

उनकी आँखोंसे कृपाकी वर्षा हो रही थी। उनके मुखपर मन्द हास्यकी रेखा थी—जिससे उनकी प्रसन्‍नता झलक रही थी। उनके तेजसे चौंधियाकर मुनिवरने अपनी आँखें मूँद लीं॥ २५॥

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