॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.1.24
प्रणम्य दण्डवद्भूमावुपतस्थेऽर्हणाञ्जलिः।
वृषहंससुपर्णस्थान् स्वैः स्वैश्चिह्नैश्च चिह्नितान्॥ २४
praṇamya daṇḍavadbhūmāvupatasthe'rhaṇāñjaliḥ|
vṛṣahaṃsasuparṇasthān svaiḥ svaiścihnaiśca cihnitān|| 24
अर्थ
उन तीनोंका एक ही साथ प्रादुर्भाव होनेसे अत्रि मुनिका अन्तःकरण प्रकाशित हो उठा। उन्होंने एक पैरसे खड़े-खड़े ही उन देवदेवोंको देखा और फिर पृथ्वीपर दण्डके समान लोटकर प्रणाम करनेके अनन्तर अर्घ्य-पुष्पादि पूजनकी सामग्री हाथमें ले उनकी पूजा की। वे तीनों अपने-अपने वाहन—हंस, गरुड और बैलपर चढ़े हुए तथा अपने कमण्डलु, चक्र, त्रिशूलादि चिह्नोंसे सुशोभित थे॥ २३-२४॥