श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.26

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

चेतस्तत्प्रवणं युञ्जन्‍नस्तावीत्संहताञ्जलिः।

श्लक्ष्णया सूक्तया वाचा सर्वलोकगरीयसः॥ २६

cetastatpravaṇaṃ yuñjannastāvītsaṃhatāñjaliḥ|

ślakṣṇayā sūktayā vācā sarvalokagarīyasaḥ|| 26

अर्थ

वे चित्तको उन्हींकी ओर लगाकर हाथ जोड़ अति मधुर और सुन्दर भावपूर्ण वचनोंमें लोकमें सबसे बड़े उन तीनों देवोंकी स्तुति करने लगे॥ २६॥

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