श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ज्ञातोऽहं भवता त्वद्य दुर्विज्ञेयोऽपि देहिनाम्।

यन्मां त्वं मन्यसेऽयुक्तं भूतेन्द्रियगुणात्मभिः॥ ३६

jñāto'haṃ bhavatā tvadya durvijñeyo'pi dehinām|

yanmāṃ tvaṃ manyase'yuktaṃ bhūtendriyaguṇātmabhiḥ|| 36

अर्थ

तुम मुझे भूत, इन्द्रिय, गुण और अन्तःकरणसे रहित समझते हो; इससे जान पड़ता है कि यद्यपि देहधारी जीवोंको मेरा ज्ञान होना बहुत कठिन है, तथापि तुमने मुझे जान लिया है॥ ३६॥

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