श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.9.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

ऋषिमाद्यं न बध्नाति पापीयांस्त्वां रजोगुणः।

यन्मनो मयि निर्बद्धं प्रजाः संसृजतोऽपि ते॥ ३५

ṛṣimādyaṃ na badhnāti pāpīyāṃstvāṃ rajoguṇaḥ|

yanmano mayi nirbaddhaṃ prajāḥ saṃsṛjato'pi te|| 35

अर्थ

तुम सबसे पहले मन्त्रद्रष्टा हो। प्रजा उत्पन्‍न करते समय भी तुम्हारा मन मुझमें ही लगा रहता है, इसीसे पापमय रजोगुण तुमको बाँध नहीं पाता॥ ३५॥

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