श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.1

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

अथ पञ्चमोऽध्यायः

विदुरजीका प्रश्न और मैत्रेयजीका सृष्टिक्रमवर्णन

श्रीशुक उवाच

द्वारि द्युनद्या ऋषभः कुरूणां

मैत्रेयमासीनमगाधबोधम् ।

क्षत्तोपसृत्याच्युतभावशुद्धः

पप्रच्छ सौशील्यगुणाभितृप्तः॥ १

dvāri dyunadyā ṛṣabhaḥ kurūṇāṃ

maitreyamāsīnamagādhabodham |

kṣattopasṛtyācyutabhāvaśuddhaḥ

papraccha sauśīlyaguṇābhitṛptaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परमज्ञानी मैत्रेय मुनि (हरिद्वारक्षेत्रमें) विराजमान थे। भगवद्भक्तिसे शुद्ध हुए हृदयवाले विदुरजी उनके पास जा पहुँचे और उनके साधुस्वभावसे आप्यायित होकर उन्होंने पूछा॥ १॥✎ 1299

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1299 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): साधु-स्वभावसे → साधुस्वभावसे

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