कालिन्द्याः कतिभिः सिद्ध अहोभिर्भरतर्षभः।
प्रापद्यत स्वःसरितं यत्र मित्रासुतो मुनिः॥ ३६
इसके पश्चात् सिद्धशिरोमणि विदुरजी यमुनातटसे चलकर कुछ दिनोंमें गंगाजीके किनारे जा पहुँचे, जहाँ श्रीमैत्रेयजी रहते थे॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.4.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 252) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/4/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)