श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.4.35

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

आत्मानं च कुरुश्रेष्ठ कृष्णेन मनसेक्षितम्।

ध्यायन् गते भागवते रुरोद प्रेमविह्वलः॥ ३५

ātmānaṃ ca kuruśreṣṭha kṛṣṇena manasekṣitam|

dhyāyan gate bhāgavate ruroda premavihvalaḥ|| 35

अर्थ

कुरुश्रेष्ठ परीक्षित्! परमात्मा श्रीकृष्णने लीलासे ही अपना श्रीविग्रह प्रकट किया था और लीलासे ही उसे अन्तर्धान भी कर दिया। उनका वह अन्तर्धान होना भी धीर पुरुषोंका उत्साह बढ़ानेवाला तथा दूसरे पशुतुल्य अधीर पुरुषोंके लिये अत्यन्त दुष्कर था। परम भागवत उद्धवजीके मुखसे उनके प्रशंसनीय कर्म और इस प्रकार अन्तर्धान होनेका समाचार पाकर तथा यह जानकर कि भगवान्‌ने परमधाम जाते समय मुझे भी स्मरण किया था, विदुरजी उद्धवजीके चले जानेपर प्रेमसे विह्वल होकर रोने लगे॥ ३३—३५॥✎ 208

यह अर्थ श्लोक 33–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #208 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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