॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.39
नैतत्खलायोपदिशेन्नाविनीताय कर्हिचित्।
न स्तब्धाय न भिन्नाय नैव धर्मध्वजाय च॥ ३९
naitatkhalāyopadiśennāvinītāya karhicit|
na stabdhāya na bhinnāya naiva dharmadhvajāya ca|| 39
अर्थ
मैंने तुम्हें जो ज्ञानोपदेश दिया है—उसे दुष्ट, दुर्विनीत, घमंडी, दुराचारी और धर्मध्वजी (दम्भी) पुरुषोंको नहीं सुनाना चाहिये॥ ३९॥