॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.32.40
न लोलुपायोपदिशेन्न गृहारूढचेतसे।
नाभक्ताय च मे जातु २ न मद्भक्तद्विषामपि॥ ४०
na lolupāyopadiśenna gṛhārūḍhacetase|
nābhaktāya ca me jātu na madbhaktadviṣāmapi|| 40
अर्थ
जो विषयलोलुप हो, गृहासक्त हो, मेरा भक्त न हो अथवा मेरे भक्तोंसे द्वेष करनेवाला हो, उसे भी इसका उपदेश कभी न करे॥ ४०॥
टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—ज्ञानं।