श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.40

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

न लोलुपायोपदिशेन्‍न गृहारूढचेतसे।

नाभक्ताय च मे जातु २ न मद्भक्तद्विषामपि॥ ४०

na lolupāyopadiśenna gṛhārūḍhacetase|

nābhaktāya ca me jātu na madbhaktadviṣāmapi|| 40

अर्थ

जो विषयलोलुप हो, गृहासक्त हो, मेरा भक्त न हो अथवा मेरे भक्तोंसे द्वेष करनेवाला हो, उसे भी इसका उपदेश कभी न करे॥ ४०॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—ज्ञानं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 399)

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