श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.38

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

जीवस्य संसृतीर्बह्वीरविद्याकर्मनिर्मिताः।

यास्वङ्ग प्रविशन्‍नात्मा न वेद गतिमात्मनः॥ ३८

jīvasya saṃsṛtīrbahvīravidyākarmanirmitāḥ|

yāsvaṅga praviśannātmā na veda gatimātmanaḥ|| 38

अर्थ

देवि! अविद्याजनित कर्मके कारण जीवकी अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जानेपर वह अपने स्वरूपको नहीं पहचान सकता॥ ३८॥

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