श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.32

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

ज्ञानयोगश्‍च मन्‍निष्ठो नैर्गुण्यो भक्तिलक्षणः।

द्वयोरप्येक एवार्थो भगवच्छब्दलक्षणः॥ ३२

jñānayogaśca manniṣṭho nairguṇyo bhaktilakṣaṇaḥ|

dvayorapyeka evārtho bhagavacchabdalakṣaṇaḥ|| 32

अर्थ

देवि! निर्गुणब्रह्म-विषयक ज्ञानयोग और मेरे प्रति किया हुआ भक्तियोग—इन दोनोंका फल एक ही है। उसे ही भगवान् कहते हैं॥ ३२॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें