जिस प्रकार रूप, रस एवं गन्ध आदि अनेक गुणोंका आश्रयभूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा विभिन्नरूपसे अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्रके विभिन्न मार्गोंद्वारा एक ही भगवान्की अनेक प्रकारसे अनुभूति होती है॥ ३३॥✎ 348
यथेन्द्रियैः पृथग्द्वारैरर्थो बहुगुणाश्रयः।
एको नानेयते तद्वद्भगवान् शास्त्रवर्त्मभिः॥ ३३
जिस प्रकार रूप, रस एवं गन्ध आदि अनेक गुणोंका आश्रयभूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियोंद्वारा विभिन्नरूपसे अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्रके विभिन्न मार्गोंद्वारा एक ही भगवान्की अनेक प्रकारसे अनुभूति होती है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.32.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 399) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/32/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)