श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.32.22

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

तस्मात्त्वं सर्वभावेन भजस्व परमेष्ठिनम्।

तद‍्गुणाश्रयया भक्‍त्या भजनीयपदाम्बुजम्॥ २२

tasmāttvaṃ sarvabhāvena bhajasva parameṣṭhinam|

tadguṇāśrayayā bhaktyā bhajanīyapadāmbujam|| 22

अर्थ

इसलिये माताजी! जिनके चरणकमल सदा भजनेयोग्य हैं, उन भगवान्‌का तुम उन्हींके गुणोंका आश्रय लेनेवाली भक्तिके द्वारा सब प्रकारसे (मन, वाणी और शरीरसे) भजन करो॥ २२॥

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