पदार्थोंकी उपलब्धिके स्थानरूप इस स्थूलशरीरमें जब उनको ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं रहती, यह उसका मरण है और यह स्थूलशरीर ही मैं हूँ—इस अभिमानके साथ उसे देखना उसका जन्म है॥ ४५॥
द्रव्योपलब्धिस्थानस्य द्रव्येक्षायोग्यता यदा।
तत्पञ्चत्वमहं मानादुत्पत्तिर्द्रव्यदर्शनम्॥ ४५
पदार्थोंकी उपलब्धिके स्थानरूप इस स्थूलशरीरमें जब उनको ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं रहती, यह उसका मरण है और यह स्थूलशरीर ही मैं हूँ—इस अभिमानके साथ उसे देखना उसका जन्म है॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 395) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/45/