श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.46

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

यथाक्ष्णोर्द्रव्यावयवदर्शनायोग्यता यदा।

तदैव चक्षुषो द्रष्टुर्द्रष्टृत्वायोग्यतानयोः॥ ४६

yathākṣṇordravyāvayavadarśanāyogyatā yadā|

tadaiva cakṣuṣo draṣṭurdraṣṭṛtvāyogyatānayoḥ|| 46

अर्थ

नेत्रोंमें जब किसी दोषके कारण रूपादिको देखनेकी योग्यता नहीं रहती, तभी उनमें रहनेवाली चक्षु-इन्द्रिय भी रूप देखनेमें असमर्थ हो जाती है और जब नेत्र और उनमें रहनेवाली इन्द्रिय दोनों ही रूप देखनेमें असमर्थ हो जाते हैं, तभी इन दोनोंके साक्षी जीवमें भी वह योग्यता नहीं रहती॥ ४६॥

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