श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.44

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

जीवो ह्यस्यानुगो देहो भूतेन्द्रियमनोमयः।

तन्‍निरोधोऽस्य मरणमाविर्भावस्तु सम्भवः॥ ४४

jīvo hyasyānugo deho bhūtendriyamanomayaḥ|

tannirodho'sya maraṇamāvirbhāvastu sambhavaḥ|| 44

अर्थ

जीवका उपाधिरूप लिंगशरीर तो मोक्षपर्यन्त उसके साथ रहता है तथा भूत, इन्द्रिय और मनका कार्यरूप स्थूलशरीर इसका भोगाधिष्ठान है। इन दोनोंका परस्पर संगठित होकर कार्य न करना ही प्राणीकी ‘मृत्यु’ है और दोनोंका साथ-साथ प्रकट होना ‘जन्म’ कहलाता है॥ ४४॥

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