श्रीभगवान् कहते हैं—माताजी! जब जीवको मनुष्य-शरीरमें जन्म लेना होता है, तो वह भगवान्की प्रेरणासे अपने पूर्वकर्मानुसार देहप्राप्तिके लिये पुरुषके वीर्यकणके द्वारा स्त्रीके उदरमें प्रवेश करता है॥ १॥✎ 339
कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये।
स्त्रियाः प्रविष्ट उदरं पुंसो रेतःकणाश्रयः॥ १
श्रीभगवान् कहते हैं—माताजी! जब जीवको मनुष्य-शरीरमें जन्म लेना होता है, तो वह भगवान्की प्रेरणासे अपने पूर्वकर्मानुसार देहप्राप्तिके लिये पुरुषके वीर्यकणके द्वारा स्त्रीके उदरमें प्रवेश करता है॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.31.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 388) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/31/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)