श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.30.34

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

अधस्तान्‍नरलोकस्य यावतीर्यातनादयः।

क्रमशः समनुक्रम्य पुनरत्राव्रजेच्छुचिः॥ ३४

adhastānnaralokasya yāvatīryātanādayaḥ|

kramaśaḥ samanukramya punaratrāvrajecchuciḥ|| 34

अर्थ

मनुष्य-जन्म मिलनेके पूर्व जितनी भी यातनाएँ हैं तथा शूकर-कूकरादि योनियोंके जितने कष्ट हैं, उन सबको क्रमसे भोगकर शुद्ध हो जानेपर वह फिर मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है॥ ३४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कापिलेयोपाख्याने
कर्मविपाको नाम त्रिंशोऽध्यायः॥ ३०॥

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