श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.31.2

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

कललं त्वेकरात्रेण पञ्चरात्रेण बुद्बुदम्।

दशाहेन तु कर्कन्धूः पेश्यण्डं वा ततः परम्॥ २

kalalaṃ tvekarātreṇa pañcarātreṇa budbudam|

daśāhena tu karkandhūḥ peśyaṇḍaṃ vā tataḥ param|| 2

अर्थ

वहाँ वह एक रात्रिमें स्त्रीके रजमें मिलकर एकरूप कलल बन जाता है, पाँच रात्रिमें बुद्बुदरूप हो जाता है, दस दिनमें बेरके समान कुछ कठिन हो जाता है और उसके बाद मांसपेशी अथवा अण्डज प्राणियोंमें अण्डेके रूपमें परिणत हो जाता है॥ २॥✎ 339

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #339 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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