॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.28.19
स्थितं व्रजन्तमासीनं शयानं वा गुहाशयम्।
प्रेक्षणीयेहितं ध्यायेच्छुद्धभावेन चेतसा॥ १९
sthitaṃ vrajantamāsīnaṃ śayānaṃ vā guhāśayam|
prekṣaṇīyehitaṃ dhyāyecchuddhabhāvena cetasā|| 19
अर्थ
भगवान्की लीलाएँ बड़ी दर्शनीय हैं; अतः अपनी रुचिके अनुसार खड़े हुए, चलते हुए, बैठे हुए, पौढ़े हुए अथवा अन्तर्यामीरूपमें स्थित हुए उनके स्वरूपका विशुद्ध भावयुक्त चित्तसे चिन्तन करे॥ १९॥✎ 327