इस प्रकार योगी जब यह अच्छी तरह देख ले कि भगवद्विग्रहमें चित्तकी स्थिति हो गयी, तब वह उनके समस्त अंगोंमें लगे हुए चित्तको विशेष रूपसे एक-एक अंगमें लगावे॥ २०॥✎ 327
तस्मिँल्लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम्।
विलक्ष्यैकत्र संयुज्यादंगे भगवतो मुनिः॥ २०
इस प्रकार योगी जब यह अच्छी तरह देख ले कि भगवद्विग्रहमें चित्तकी स्थिति हो गयी, तब वह उनके समस्त अंगोंमें लगे हुए चित्तको विशेष रूपसे एक-एक अंगमें लगावे॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 375) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/28/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)