श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.18

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

कीर्तन्यतीर्थयशसं पुण्यश्लोकयशस्करम्।

ध्यायेद्देवं समग्रांगं यावन्‍न च्यवते मनः॥ १८

kīrtanyatīrthayaśasaṃ puṇyaślokayaśaskaram|

dhyāyeddevaṃ samagrāṃgaṃ yāvanna cyavate manaḥ|| 18

अर्थ

उनका पवित्र यश परम कीर्तनीय है और वे राजा बलि आदि परम यशस्वियोंके भी यशको बढ़ानेवाले हैं। इस प्रकार श्रीनारायणदेवका सम्पूर्ण अंगोंके सहित तबतक ध्यान करे, जबतक चित्त वहाँसे हटे नहीं॥ १८॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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