श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.28.17

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अपीच्यदर्शनं शश्‍वत्सर्वलोकनमस्कृतम्।

सन्तं वयसि कैशोरे भृत्यानुग्रहकातरम्॥ १७

apīcyadarśanaṃ śaśvatsarvalokanamaskṛtam|

santaṃ vayasi kaiśore bhṛtyānugrahakātaram|| 17

अर्थ

उनकी अति सुन्दर किशोर अवस्था है, वे भक्तोंपर कृपा करनेके लिये आतुर हो रहे हैं। बड़ी मनोहर झाँकी है। भगवान् सदा सम्पूर्ण लोकोंसे वन्दित हैं॥ १७॥✎ 327

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #327 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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