जैसे सोये हुए पुरुषको स्वप्नमें कितने ही अनर्थोंका अनुभव करना पड़ता है, किन्तु जग पड़नेपर उसे उन स्वप्नके अनुभवोंसे किसी प्रकारका मोह नहीं होता॥ २५॥✎ 3231597
यथा ह्यप्रतिबुद्धस्य प्रस्वापो बह्वनर्थभृत्।
स एव प्रतिबुद्धस्य न वै मोहाय कल्पते॥ २५
जैसे सोये हुए पुरुषको स्वप्नमें कितने ही अनर्थोंका अनुभव करना पड़ता है, किन्तु जग पड़नेपर उसे उन स्वप्नके अनुभवोंसे किसी प्रकारका मोह नहीं होता॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.27.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 372) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/27/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#323 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्ने